अल नीनो का बड़ा असर मॉनसून के खत्म होने के बाद देखने को मिलेगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह सुपर अल नीनो अगस्त और सितंबर में दस्तक देगा। भारत में यह समय खेती के लिए बहुत अहम होता है।
इस साल के अंत तक भारत पर बहुत बड़ा खतरा मंडरा रहा है। यह खतरा है सुपर अल नीनो का। रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रशांत महासागर में एक बेहद शक्तिशाली अल नीनो विकसित हो रहा है। अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA ने इसे लेकर कुछ चौंकाने वाले डिटेल्स साझा किए हैं। इसके मुताबिक यह पिछले 7 दशकों में सबसे ताकतवर अल नीनो होगा। सितंबर तक सुपर अल नीनो का प्रभाव शुरू होने के बाद इस साल के अंत तक इसका तांडव चरम पर होगा। ऐसे में भारत के लिए चिंताएं बढ़ती जा रही हैं।
अमेरिकी एजेंसी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक यह अल नीनो 1950 के बाद अब तक का सबसे मजबूत अल नीनो होगा। इस बार इसके बेहद शक्तिशाली होने की लगभग 70 फीसदी संभावना जताई गई है। वहीं एजेंसी के मुताबिक भारत सहित पूरे उत्तरी गोलार्ध में सर्दियों में मौसम में अल नीनो के बेहद मजबूत होने की 90 फीसदी संभावना है। इसके कारण भारत के कई हिस्सों में मौसम का मिजाज बदल सकता है। देश में कम बारिश की वजह से सूखे जैसी स्थिति भी बन सकती है।
क्या होता है अल नीनो?
अल नीनो प्रशांत महासागर की सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने की एक प्रक्रिया है। सामान्य दिनों में चलने वाली हवाएं गर्म पानी को एशिया की तरफ धकेलती हैं, लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, तो यह गर्म पानी वापस अमेरिका और मध्य प्रशांत की ओर लौटने लगता है। इस बदलाव के कारण पूरी दुनिया का मौसम चक्र बिगड़ जाता है। जहां एक तरफ भारत जैसे देशों में मानसून कमजोर पड़ता है और सूखे के हालात बनते हैं, वहीं दूसरी तरफ कई देशों में भारी बारिश और बाढ़ आती है।
मॉनसून पर कितना असर?
भारत के लिए अल नीनो इसीलिए बड़ा खतरा है, क्योंकि अल नीनो के सालों में अक्सर मॉनसून के सामान्य से कमजोर रहने की स्थिति देखी गई है। इस साल भारत में मॉनसून पहले से ही सामान्य से कमजोर रहा है। 1 जून से 13 अगस्त के बीच देश में 491.8 मिमी बारिश हुई है। यह सामान्य से 12 फीसदी कम है। वहीं जून में सामान्य से 35.4 फीसदी कम बारिश हुई है। जुलाई में बारिश लगभग सामान्य रही है लेकिन IMD ने अगस्त और में भी सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया है। इसके अलावा अल नीनो का खेती पर भी सीधा प्रभाव पड़ता है। भारत की लगभग आधी खेती सीधे तौर पर मॉनसून के पानी पर निर्भर है। ऐसे में कम बारिश की वजह से खरीफ फसलों को बड़ा नुकसान हो सकता है।
थोड़ी राहत की उम्मीद
हालांकि इस बार अल नीनो के मजबूत होने का समय भारत के लिए राहत की खबर है। आमतौर पर भारतीय महासागर और भारत के आसपास के क्षेत्रों में अल नीनो का प्रभाव करीब 40-45 दिन की देरी से दिखाई देते हैं। ऐसे में जब तक अल नीनो का प्रभाव ज्यादा स्पष्ट होगा, तब तक मॉनसून भारत में अपने आखिरी चरण में होगा। इसके अलावा अल नीनो के प्रभाव को कुछ हद तक इंडियन ओशियन डायपोल (IOD) संतुलित कर सकता है। IMD का अनुमान है कि मॉनसून के अंत तक IOD सकारात्मक हो सकता है। बता दें कि सकारात्मक IOD की स्थिति अल नीनो के प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकता है।