ब्रिक्स पर बंटी कांग्रेस: चिदंबरम ने उठाए सवाल तो थरूर ने गिनाए फ़ायदे


शशि थरूर और चिदंबरम

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इमेज कैप्शन, पी चिदंबरम ने ब्रिक्स आयोजन पर सवाल उठाए, वहीं शशि थरूर ने इसे भारत के लिए प्रतिष्ठा बताया

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ब्रिक्स देशों का 18वां शिखर सम्मेलन दिल्ली में हो रहा है और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत कई देशों के नेता राजधानी आ रहे हैं.

इस बीच इस आयोजन को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में मतभेद उभर कर सामने आए हैं. पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने ब्रिक्स जैसे आयोजनों से भारत को मिलने वाले ठोस फ़ायदे पर सवाल उठाए हैं.

वहीं तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने प्रतिक्रिया देते हुए भारत की कूटनीतिक क्षमता की तारीफ़ की है.

पी चिदंबरम के बयान को लेकर बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी ने गुरुवार को तीख़ी प्रतिक्रिया दी है और उन्हें नाराज़ फूफा बताया.

सुधांशु त्रिवेदी ने कहा, “कांग्रेस के दिग्गज नेता पी चिदंबरम का बयान उनकी ‘दिमागी क्षमता पर सवाल’ उठाता है. यह बयान देकर उन्होंने ‘खुद को नाराज़ फूफा साबित’ कर दिया है.”

उन्होंने कहा, “रूस के राष्ट्रपति पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान समेत दुनिया के कई नेता आ रहे हैं और ऐसा लगता है कि वो (चिदंबरम) अपनी समझदारी इन सारे राष्ट्राध्यक्षों से ऊपर दिखाना चाहते हैं.”

दरअसल, भारत ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ), जी20 और क्वाड समेत कई बहुपक्षीय समूहों का हिस्सा है.

पी चिदंबरम ने बुधवार को समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में कहा था कि पिछली दो या तीन शिखर सम्मेलनों से उन्हें कोई ठोस नतीजा नज़र नहीं आया. उन्होंने पूछा, “इनसे देश को क्या ठोस फ़ायदा मिला?

उधर, कांग्रेस एक अन्य वरिष्ठ नेता सलमान ख़ुर्शीद ने चिदंबरम के बयान को संतुलित करने की कोशिश करते हुए ब्रिक्स को ‘ग्लोबल नॉर्थ और ग्लोबल साउथ के बीच एक ब्रिज’ बताया.

उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया ब्रिक्स की भूमिका को समझती है और उम्मीद करती है कि भारत इसमें अहम रोल निभाए.

उन्होंने एएनआई से कहा, “हम विपक्ष में महसूस करते हैं कि यह सिर्फ़ सरकार नहीं, बल्कि पूरे भारत का प्रतिनिधित्व है, जिसमें विपक्ष भी शामिल है. इसलिए हमारा प्रतिनिधित्व सही तरीके से होना चाहिए. अगर उन्होंने हमसे सलाह ली होती, तो यह और बेहतर होता. लेकिन यह उनकी नीति नहीं है.”

चिदंबरम ने क्या कहा था?

पी चिदंबरम

ब्रिक्स सम्मेलन में रूस और चीन के राष्ट्रपतियों के आगमन को लेकर पूछे गए एक सवाल पर चिदंबरम ने एएनआई से कहा, “मुझे नहीं पता कि कितने राष्ट्रपति और कितने प्रधानमंत्री आ रहे हैं.”

“मुझे नहीं लगता कि पिछले दो या तीन ब्रिक्स शिखर सम्मेलनों से कोई ठोस फ़ायदा या ठोस नतीजा निकला है. असल में हम ब्रिक्स, एससीओ, जी20, क्वाड का हिस्सा हैं. मुझे नहीं लगता कि पिछले तीन या चार समिट में हमें कोई फ़ायदा हुआ है.”

“पहले के ब्रिक्स सम्मेलनों में कुछ ठोस फ़ायदे होते थे. मुझे नहीं पता कि पिछले दो या तीन ब्रिक्स शिखर सम्मेलनों से ऐसा क्या फ़ायदा मिला जिसे याद रखा जाए. मुझे नहीं याद पड़ता.”

चिदंबरम के इस बयान की बीजेपी नेताओं ने पुरज़ोर मजम्मत की है. बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कहा, “जब भी देश में कुछ बेहतर होता है, नाराज़ फूफा कांग्रेस को दिक्कत होती है.”

प्रदीप भंडारी ने चिदंबरम के सवाल का जवाब देते हुए दावा किया, “ब्रिक्स देशों को भारत का निर्यात बढ़कर करीब 85 अरब डॉलर हो गया है, जबकि विस्तारित ब्रिक्स समूह में दुनिया की करीब आधी आबादी शामिल है और यह वैश्विक जीडीपी का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा है.”

ब्रिक्स 2026 की वेबसाइट के अनुसार, ब्रिक्स देशों की जनसंख्या दुनिया की आबादी का लगभग 49.5% है और इसकी वैश्विक व्यापार में 26% हिस्सेदारी है.

शशि थरूर ने क्या कहा?

शशि थरूर

थरूर ने ब्रिक्स को ग्लोबल साउथ के लिए एक अहम मंच बताया है.

थरूर ने कहा, “हम ग्लोबल साउथ के लिए एक अहम मंच मुहैया करा रहे हैं. ग्लोबल साउथ में 100 से ज़्यादा देश हैं, लेकिन यहां ग्लोबल साउथ के 11 प्रमुख देश हैं. वे विचारों की विविधता के साथ-साथ उन देशों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनकी हम इस मौक़े पर मूल रूप से अध्यक्षता कर रहे हैं. ब्रिक्स के ये 11 देश दुनिया की आबादी के बहुमत और वैश्विक जीडीपी के 41 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं.”

उन्होंने कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों, सरकार प्रमुखों और पर्यवेक्षक देशों के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के आने को प्रतिष्ठा की बात बताई.

शशि थरूर ने कहा, “यह हमारी एक तरह की कूटनीतिक तौर पर लोगों को एक साथ लाने की क्षमता दिखाता है, जिसका वैश्विक मंच पर अपने आप में महत्व है.”

उन्होंने कहा, “अब इसका मतलब यह नहीं है कि इसके सिर्फ़ फ़ायदे ही हैं. इसके सामने चुनौतियां भी हैं. ख़ास तौर पर यह कि विचारों में समानता ढूंढना मुश्किल है. उदाहरण के लिए, वैश्विक मुद्दों पर किसी साझा घोषणा को लेकर सहमति बनाना.”

उन्होंने कहा कि ब्रिक्स के विदेश मंत्री ईरान युद्ध और रूस-यूक्रेन संघर्ष पर साझा बयान पर एकमत नहीं हो सके थे. थरूर ने कहा कि अगर ऐसा दोबारा होता है तो कुछ लोग इसे झटके के तौर पर देखेंगे.

उन्होंने कहा, “जब विदेश मंत्रियों की बैठक हुई तो आख़िर में भारत ने अध्यक्ष के तौर पर साझा घोषणा जारी करने के बजाय अध्यक्ष की घोषणा जारी की. क्या ऐसा दोबारा होगा? कुछ लोग इसे शायद एक झटका और शायद समूह के बुनियादी तौर पर एकजुट न होने के संकेत के तौर पर देखेंगे, या क्या हम मतभेदों पर पर्दा डाल पाएंगे? यह हमारे राजनयिकों के लिए एक बड़ी चुनौती होगी.”

ब्रिक्स से क्या फ़ायदा बताया एक्सपर्ट्स ने?

ब्रिक्स 2026

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इमेज कैप्शन, दिल्ली में ब्रिक्स 2026 का शिखर सम्मेलन शनिवार और रविवार को हो रहा है

भारत के जाने-माने सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने ब्रिक्स ग्रुपिंग को पश्चिम देशों के दबदबे को चुनौती देने वाला बताया है.

उन्होंने एक्स पर लिखा, “ब्रिक्स महज़ एक प्रतीकात्मक समूह नहीं है, न ही यह दुनिया को सिर्फ़ यह संदेश देने तक सीमित है कि पश्चिमी देशों का दबदबा अब ख़त्म होने वाला है. इस समूह ने संस्थागत ढांचा तैयार करने की दिशा में ठोस प्रगति की है. ब्रिक्स का न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) और कंटिंजेंट रिज़र्व अरेंजमेंट (सीआरए) बुनियादी ढांचे के लिए वित्त और नक़दी उपलब्ध कराने का एक वैकल्पिक स्रोत देते हैं. ये संस्थाएं पश्चिमी देशों की पारंपरिक राजनीतिक शर्तों के बिना काम करती हैं.”

चेलानी ने ब्रिक्स की उपलब्धि को बताते हुए लिखा है, “ब्रिक्स ने एक ऐसी सोच को सामान्य बना दिया है, जो कभी असंभव लगती थी- उभरती अर्थव्यवस्थाएं आपस में सहयोग कर सकती हैं, अपने संस्थान बना सकती हैं और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को व्यवस्थित करने के तरीके को बदल सकती हैं. यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है.”

उनके अनुसार, “ब्रिक्स पश्चिम-केंद्रित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से एक वास्तविक बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बदलाव में एक अहम भूमिका निभाता है. शनिवार से शुरू होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेज़बानी कर रहा नई दिल्ली, ब्रिक्स को सुधारों के साथ बहुपक्षवाद के लिए एक ऐसे मंच के रूप में आकार देना चाहता है, जिसका रुख़ साफ़ तौर पर पश्चिम-विरोधी न हो.”

“यह भारत की उस रणनीतिक सोच के अनुरूप है, जिसमें गुटों की राजनीति से दूरी रखते हुए कई देशों के साथ एक साथ रिश्ते बनाए रखने पर ज़ोर दिया जाता है.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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