मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने साल 2026 विधानसभा चुनाव में भवानीपुर और नंदीग्राम दोनों सीटों पर जीत हासिल की थी। बाद में उन्होंने भवानीपुर सीट को बनाए रखा और नंदीग्राम सीट छोड़ दी थी। अब यहां 6 अक्टूबर को उपचुनाव होना है।
तीन महीने पहले की ही बात है। पश्चिम बंगाल विधानसभा की सभी सीटों पर वोटिंग हो चुकी थी और फाल्टा में मतदान होना बाकी था। तृणमूल कांग्रेस राज्य गंवाने के बाद गढ़ बचाने के मूड में थी। अचानक वोटिंग के दो दिन पहले पार्टी को झटका लगता है और बाहुबली उम्मीदवार जहांगीर खान उर्फ पुष्पा नाम वापस ले लेते हैं। नतीजा होता है कि सीट पर कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और लेफ्ट के बीच मुकाबला हुआ और भाजपा जीत गई। अब ऐसे ही संकट नंदीग्राम सीट पर भी ममता बनर्जी के तैयार होता नजर आ रहा है, जहां 6 अक्टूबर को उपचुनाव के लिए वोटिंग होना है।
नंदीग्राम सीट कई मायनों में पश्चिम बंगाल की हाइ प्रोफाइल सीट है। इसकी शुरुआत राज्य में टीएमसी के उदय से भी होती है। साल 2007 में यहां भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन हुआ था, जिसमें ममता बनर्जी ने बड़ी भूमिका निभाई थी। दूसरी वजह, यह टीएमसी सुप्रीमो का गढ़ भी रहा है। तीसरी और चौथी वजह एक है कि 2021 और 2026 विधानसभा चुनाव के बाद यह भाजपा के लिए मजबूत सीट बन गई है। शुभेंदु अधिकारी ने यहां से दोनों पूर्व करीबियों को हराया है। पहले ममता बनर्जी और फिर पवित्र कर को।
फाल्टा जैसा होगा हाल
फाल्टा में चुनाव आयोग ने वोटिंग रद्द कर दी थी और नई तारीख दी थी। जब तक यहां चुनाव की तैयारियां हुईं, तब तक टीएमसी बंगाल का किला गंवा चुकी थी। अब उम्मीद थी कि भतीजे अभिषेक बनर्जी के करीबी और इलाके के बाहुबली जहांगीर खान सीट को बचाए रखेंगे, लेकिन घटनाक्रम टीएमसी के पक्ष में नहीं हुए और खान ने वोटिंग के ठीक पहले नाम वापस ले लिया।
क्यों अहम थी फाल्टा सीट
टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी डायमंड हार्बर लोकसभा सीट से सांसद हैं और फाल्टा सीट उनके ही क्षेत्र में आती है। यह साल 2011 से ही टीएमसी का गढ़ था। वहीं, 2026 का चुनाव ‘पुष्पा’ के जिक्र के चलते और साख की लड़ाई में तब्दील हो गया था। खान के नाम वापस लेने के बाद एक ओर जहां भाजपा ने तंज कसना शुरू कर दिए थे। वहीं, टीएमसी ने इसे जहांगीर का निजी फैसला करार दिया था।
नंदीग्राम में क्यों बन रहे हैं ऐसे हालात
नंदीग्राम में स्थिति अभी फाल्टा की तरह नहीं हुई है। चुनाव में अभी समय है, लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी उम्मीदवारों को तलाशने में मुश्किलों का सामना कर रही है। हालांकि, ये महज अटकलें ही हैं और अब तक इसे लेकर किसी ने आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा है। पहला संकेत मंगलवार को हुई डीएम की बुलाई सर्वदलीय बैठक से मिला, जिसमें टीएमसी को छोड़कर सभी दल पहुंचे। इसके बाद चर्चाएं शुरू हो गईं कि क्या पार्टी उम्मीदवार उतारने वाली है या नहीं।
दूसरा संकेत पार्टी के ही वरिष्ठ नेताओं का चुनाव से साफतौर पर दूरी बना लेना है। टीएमसी से लंबे समय से जुड़े अबू ताहेर ने कहा दिया कि यहां से ममता बनर्जी को खुद ही चुनाव लड़ना चाहिए और ‘मैं क्यों लड़ूं।’ इतना ही नहीं यहां से उम्मीदवारी को टीएमसी नेता बली का बकरा बनाया जाना मान रहे हैं।
उन्होंने कहा, ‘टीएमसी के सत्ता में रहने के 15 वर्षों के दौरान मुझे क्या मिला? इन 15 वर्षों में मुझे कभी भी टीएमसी का उम्मीदवार नहीं माना गया। मुझे अयोग्य समझा गया। फिर अब मुझे बलि का बकरा बनाने के लिए क्यों चुना जाना चाहिए?’ उन्होंने साफ कर दिया है कि अगर पार्टी कहती भी है, तो भी वह चुनाव लड़ने से इनकार कर देंगे।
तीसरी संकेत, हाल ही में हुई विधायक दल की टूट से मिल रहे हैं। टीएमसी दो गुटों में बट चुकी है, जिसमें एक की अगुवाई ऋताब्रत बनर्जी कर रहे हैं और दूसरे को कालीघाट टीएमसी कहा जाने लगा है। हालांकि, पार्टी का नाम और चिह्न अब भी ममता बनर्जी वाले गुट के पास ही है।















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