डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के बीच 14 जून 2026 को नीस में हुई मुलाकात केवल जी-20 शिखर सम्मेलन के इतर हुई एक औपचारिक द्विपक्षीय बैठक भर नहीं थी।
कई मायनों में यह दशकों से बने गहरे भरोसे की नई कहनी थी, जिसे अब औपचारिक रूप से विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी के स्तर पर उन्नत कर दिया गया है। पिछले एक वर्ष के दौरान दोनों देशों के बीच हुए उच्चस्तरीय दौरों, समझौतों और रक्षा वार्ताओं की श्रृंखला यह दर्शाती है कि भारत और फ्रांस के संबंधों का यह तो बस एक नया आरंभ है।
अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद से लेकर फ्रांस के नेतृत्व में विकसित हो रहे छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान में भारत की संभावित भागीदारी तक, दोनों देश अपने रिश्तों को गहन तकनीकी और रणनीतिक सहयोग की ओर तेजी से आगे बढ़ा रहे हैं।
समय की कसौटी पर परखा गया ऐतिहासिक संबंध
भारत 1950 के दशक से ही फ्रांसीसी विमानों और सैन्य उपकरणों का संचालन करता रहा है। भारतीय वायुसेना ने तूफानी, मिस्टेयर, जगुआर, मिराज-2000 और अब राफेल जैसे लड़ाकू विमानों का सफलतापूर्वक संचालन किया है, जबकि नौसेना ने एलीजे और थल सेना ने चीता व चेतक हेलीकॉप्टरों का उपयोग किया है।
मिराज-2000 पर प्रशिक्षण लेने वाले पहले बैच के लड़ाकू पायलट रहे एयर मार्शल अनिल चोपड़ा के अनुसार, फ्रांस और भारत ने सैन्य विमानन के क्षेत्र में एक ऐसा विश्वसनीय संबंध बनाया है जो कई दशकों में विकसित हुआ है।
1947 में भारत की स्वतंत्रता के तुरंत बाद स्थापित राजनयिक संबंध भू-राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद हमेशा स्थिर और मजबूत बने रहे हैं, जिसने नई दिल्ली में फ्रांस की एक भरोसेमंद रक्षा भागीदार के रूप में साख स्थापित की है।

रक्षा साझेदारी का विस्तार
सैन्य विमानन भारत-फ्रांस रक्षा संबंधों के केंद्र में रहा है और इस विश्वास को 26 जनवरी 1998 को औपचारिक रूप दिया गया, जब दोनों देशों ने रणनीतिक साझेदारी स्थापित की। तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति जैक शिराक और भारतीय प्रधानमंत्री आई.के. गुजराल द्वारा हस्ताक्षरित यह समझौता भारत की किसी पश्चिमी देश के साथ पहली ऐसी साझेदारी थी।
यह मुख्य रूप से रक्षा और सुरक्षा, नागरिक परमाणु सहयोग और अंतरिक्ष अन्वेषण के तीन स्तंभों पर आधारित थी। समय के साथ इस साझेदारी का दायरा एआई, समुद्री अर्थव्यवस्था, नवाचार, नवीकरणीय ऊर्जा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में त्रिपक्षीय सहयोग तक विस्तृत हो चुका है।
वर्ष 2023 में साझेदारी की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर होराइजन 2047 रोडमैप अपनाया गया, जिसने अगले पच्चीस वर्षों की रूपरेखा तय की। इसके बाद फरवरी 2026 में मुंबई और नई दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट के दौरान दोनों नेताओं ने संबंधों को विशेष वैश्विक रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया।
इसके उपरांत जून में प्रधानमंत्री मोदी की फ्रांस यात्रा के दौरान व्यापार को पांच वर्षों में दोगुना करने की रूपरेखा, नवाचार रोडमैप 2030, 19 संस्थागत समझौते और एआई गवर्नेंस पर एक नए संयुक्त कार्य समूह का गठन किया गया।
रक्षा सहयोग बना संबंधों की सबसे मजबूत धुरी
इन सभी बहुआयामी विकासों के बावजूद रक्षा क्षेत्र दोनों देशों के संबंधों का मुख्य आधार बना हुआ है। वर्ष 2022 में 36 राफेल विमानों की डिलीवरी, जनवरी 2025 में स्कॉर्पीन श्रेणी की छठी पनडुब्बी का जलावतरण और भारतीय नौसेना के लिए 26 राफेल-एम विमानों की खरीद का समझौता इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
इसी साल फरवरी में बेंगलुरु में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनकी फ्रांसीसी समकक्ष कैथरीन वाउटरिन की सह-अध्यक्षता में आयोजित छठी वार्षिक रक्षा वार्ता में 10-वर्षीय रक्षा सहयोग समझौते का नवीनीकरण किया गया।
इसके तहत दोनों देशों ने एक-दूसरे के सैन्य संस्थानों में अधिकारियों की पारस्परिक तैनाती पर भी सहमति जताई, जो पारंपरिक रिश्ते से आगे बढ़कर गहरे संस्थागत एकीकरण को दर्शाता है।
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ग्राहक से सह-निर्माता की ओर बढ़ता कदम
औद्योगिक स्तर पर दोनों देश अब सह-विकास और सह-उत्पादन के मॉडल पर आगे बढ़ रहे हैं। हैदराबाद में सफ्रान की विमान इंजन एमआरओ सुविधा भारत में किसी वैश्विक निर्माता द्वारा स्थापित पहला गहरा सर्विसिंग केंद्र है। इसे प्रतिवर्ष 300 एलईएपी इंजनों को संभालने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
साथ ही सफ्रान ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के साथ मिलकर भारत में ‘हैमर’ सटीक-निर्देशित मिसाइलों के उत्पादन के लिए भी साझेदारी की है। विश्लेषक इसे को-सॉवरेनिटी का मॉडल बता रहे हैं, जिसमें दोनों देश बिना किसी सैन्य गठबंधन में बंधे अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बरकरार रखते हुए साझा तकनीकी और औद्योगिक क्षमताएं विकसित कर रहे हैं।
कूटनीति से सामरिक एकीकरण तक का सफर
सैन्य नेतृत्व के बीच लगातार संपर्क और संयुक्त सैन्य अभ्यासों का विस्तार भी इस रिश्ते की गहराई को साबित करता है। दोनों देशों के थल सेना, वायु सेना और नौसेना प्रमुखों ने हाल के वर्षों में नियमित रूप से एक-दूसरे के देशों की यात्राएं की हैं।
इसके अलावा, दोनों देश अपनी थल सेनाओं के बीच शक्ति, वायु सेनाओं के बीच गरुड़ और नौसेनाओं के बीच वरुण अभ्यास आयोजित करते हैं। अंतरिक्ष सुरक्षा के बढ़ते सामरिक महत्व को देखते हुए भारत अब फ्रांस के नेतृत्व वाले एस्टरएक्स अंतरिक्ष सैन्य अभ्यास में पर्यवेक्षक की भूमिका से आगे बढ़कर पूर्ण भागीदार बन गया है।
छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान का सवाल
वैश्विक स्तर पर छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के विकास में भारत की भागीदारी की संभावना ने इस साझेदारी की ओर दुनिया का सबसे अधिक ध्यान आकर्षित किया है। फ्रांस, जर्मनी और स्पेन मिलकर फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम पर काम कर रहे हैं। हालांकि, फ्रांस की आवश्यकताएं जैसे कि विमानवाहक पोत संचालन और परमाणु निवारक क्षमता जर्मनी की तुलना में भारत की सामरिक जरूरतों से काफी अधिक मेल खाती हैं।
भारत के रक्षा मंत्रालय ने भी संकेत दिया है कि एफसीएएस में भारत की संभावित भागीदारी पर विचार-विमर्श चल रहा है। यदि यह मूर्त रूप लेता है, तो यह द्विपक्षीय रक्षा संबंधों में प्लेटफॉर्म खरीदने से लेकर अगली पीढ़ी की तकनीक के विकास तक का एक बड़ा बदलाव होगा।
114 राफेल विमानों का सौदा
इस साझेदारी की निकट भविष्य में सबसे बड़ी परीक्षा भारतीय वायुसेना के लिए 114 अतिरिक्त राफेल विमानों का लंबित सौदा होगा। डसॉल्ट एविएशन ने लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये के इस सौदे के लिए अपना तकनीकी और वाणिज्यिक प्रस्ताव सौंप दिया है।
इस सौदे के तहत 18 विमान सीधे उड़ान भरने की स्थिति में प्राप्त होंगे, जबकि 96 विमानों का निर्माण भारत में किया जाएगा। भारत के लिए इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल वायुसेना की गिरती स्क्वाड्रन संख्या को पूरा करना नहीं है, बल्कि देश के भीतर एक मजबूत एयरोस्पेस इकोसिस्टम का निर्माण करना भी है।
अमेरिकी निर्भरता से परे स्वतंत्र गठबंधन
भारत-फ्रांस की बढ़ती रणनीतिक नजदीकियों को केवल अमेरिकी नीतियों की अनिश्चितता या ट्रंप प्रशासन की विश्वसनीयता के चश्मे से देखना गलत होगा। इस रिश्ते की अपनी स्वतंत्र गतिशीलता है, जो आठ दशकों के राजनयिक जुड़ाव और लगभग तीन दशकों की रणनीतिक साझेदारी की नींव पर टिकी है।
आर्थिक मोर्चे पर भी द्विपक्षीय व्यापार 2025-26 में 13.6 अरब यूरो तक पहुंच चुका है और फ्रांस भारत के शीर्ष विदेशी निवेशकों में से एक बन गया है।
अब दोनों देश 2028 की ओर देख रहे हैं, जब रणनीतिक साझेदारी के 30 वर्ष पूरे होने पर नमस्ते फ्रांस का आयोजन होगा। तब तक यह रिश्ता शायद इस बात से बहुत आगे निकल चुका होगा कि भारत फ्रांस से क्या खरीदता है, और इस बात पर केंद्रित हो जाएगा कि दो स्वतंत्र शक्तियां मिलकर क्या निर्माण कर सकती हैं।













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