रजनीश त्रिपाठी, काठमांडू। रसुवा में बाढ़ की त्रासदी के बीच भारत की मदद पहुंची तो नेपालियों ने सामान से ज्यादा उसमें साथ देखा। भैरहवा के आनंद गुप्ता ने कहा, संकट की इस घड़ी में भारत ने पड़ोसी ही नहीं, असली भाई होने का फर्ज निभाया।
रसुवा में कई परिवारों के सामने रहने, खाने और इलाज की चिंता थी। संपर्क टूटने से अपनों तक पहुंचना मुश्किल था। ऐसे समय भारत से पहुंची राहत ने लोगों का भरोसा बढ़ा दिया।
राहत के साथ खोज और बचाव में मदद के लिए टीमें पहुंचीं तो लापता लोगों की तलाश और शवों की पहचान की उम्मीद जगी। टूटे संपर्क को जोड़ने के लिए पुल निर्माण से जुड़ी मदद से प्रभावित इलाकों में आवाजाही बहाल होने की उम्मीद भी बढ़ी।
काठमांडू के दीपेंद्र श्रेष्ठ कहते हैं कि भारत की मदद एक बार पहुंचकर रुक नहीं गई। 26 अगस्त की रात शुरू हुआ सिलसिला लगातार आगे बढ़ता रहा। पहली खेप में टेंट, कंबल, सोलर लैंप और दवाएं पहुंचीं। अगली खेपों में आपदा के बाद की जरूरत के मुताबिक सामग्री आती रही।
30 अगस्त को भारतीय वायुसेना का विमान 11 टन राहत सामग्री लेकर पहुंचा। उसके साथ प्राविधिक टोली और डीएनए विश्लेषण उपकरणों से लैस फोरेंसिक टीम भी थी। माड्यूलर स्टील ब्रिज और बेली ब्रिज के उपकरण भी नेपाल भेजे जा रहे हैं। चार दिनों में भारत सरकार की ओर से 68 टन राहत सामग्री पहुंच चुकी है।
भारत की मदद का सिलसिला नया नहीं
नेपाल में आपदा के समय भारत की मदद का सिलसिला नया नहीं है। 2015 के विनाशकारी भूकंप के बाद भारत ने बड़े पैमाने पर राहत और बचाव अभियान चलाया था।
इसके बाद भी बाढ़, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं में भारत ने राहत सामग्री और जरूरी सहायता नेपाल पहुंचाई। रसुवा की मौजूदा त्रासदी में भी भारत की त्वरित मदद उसी पड़ोसी धर्म की निरंतरता के रूप में देखी जा रही है।
इसी बीच सोनौली सीमा पर पंजाब से राहत सामग्री लेकर पहुंचे तीन ट्रकों को लौटाए जाने की खबर से नेपाल में नाराजगी सामने आई। नेपाल भारत अवध मैत्री संघ के अध्यक्ष अजय कुमार गुप्ता का कहना है कि आपदा के समय राहत सामग्री लौटाने के बजाय उसे पीड़ितों तक पहुंचाया जाना चाहिए। लोगों में इस फैसले को लेकर गुस्सा है। सरकार अपने माध्यम से मदद भेजे, लेकिन बाहर से आने वाली राहत को रोकना उचित नहीं है।
भारत सरकार के माध्यम से आने वाली सामग्री ही स्वीकार
बेलहिया के प्रमुख भंसार अधिकृत हरिहर पौडेल का कहना है कि पंजाब से आई सामग्री के साथ अधिकृत प्रपत्र नहीं था, इसलिए उसे लौटाया गया। भारत सरकार के माध्यम से आने वाली सामग्री ही स्वीकार की जाएगी।
गायत्री परिवार की ओर से दो ट्रक राहत सामग्री अधिकृत प्रपत्र और गृह मंत्रालय की सिफारिश के साथ आई थी, जिसे स्वीकार कर लिया गया।
भारत की मदद की चर्चा के बीच चीन का जिक्र होने पर लाकपा गेलू शेरपा कहते हैं कि भारत ने पड़ोसी धर्म निभाया है। चीन से अब तक 50 टन खाद्य सामग्री भेजने की चर्चा है। लेकिन उम्मीद के मुताबिक वह बहुत कम है।
काठमांडू के चालना खेल के रहने वाले तिलक श्रेष्ठ कहते हैं कि रसुवा की त्रासदी के बीच भारत से पहुंची मदद ने राहत के साथ रिश्तों में भरोसा भी बढ़ाया है। नेपालियों के बीच भारत को लेकर यही भावना उभर रही है कि संकट में साथ खड़ा होने वाला पड़ोसी ही असली भाई होता है।













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