विधानसभा में विधायक नहीं, संसद में सांसद नहीं; मायावती की बसपा का राष्ट्रीय दर्जा भी जाएगा?, National Hindi News


मायावती की BSP का संसद से पूरी तरह सफाया होने जा रहा है। 25 नवंबर के बाद राज्यसभा में भी पार्टी का कोई सांसद नहीं रहेगा। लोकसभा में BSP पहले से शून्य है। 2027 यूपी चुनाव से पहले पार्टी के राजनीतिक भविष्य पर ही सवाल।

बहुजन समाज पार्टी (BSP) का संसद में प्रतिनिधित्व खत्म होने जा रहा है। 25 नवंबर के बाद पार्टी का राज्यसभा में भी कोई सांसद नहीं रहेगा। लोकसभा में BSP पहले से ही शून्य पर है। 1989 में संसद में पहुंचने के बाद यह पहली बार होगा, जब पार्टी दोनों सदनों में पूरी तरह गैर-मौजूद होगी।

बहुजन समाज पार्टी की स्थापना 1984 में कांशीराम ने दलितों को राजनीतिक ताकत और प्रतिनिधित्व देने के उद्देश्य से की थी। पार्टी की राजनीति में यह विचार प्रमुख रहा कि जिस समुदाय की संख्या जितनी अधिक हो, सत्ता में उसकी हिस्सेदारी भी उतनी ही होनी चाहिए।

लेकिन पिछले एक दशक से BSP के राजनीतिक प्रभाव में लगातार गिरावट देखने को मिली है। अब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के सामने अपना राजनीतिक आधार बचाए रखने की बड़ी चुनौती है।

राज्यसभा में भी खत्म हो जाएगा BSP का खाता

मंगलवार को चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव का ऐलान किया। ये सीटें खाली होने वाली हैं। इनमें BSP के इकलौते राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का नाम भी शामिल है। उनका छह साल का कार्यकाल 25 नवंबर को खत्म हो रहा है। इसके बाद BSP का राज्यसभा में कोई सांसद नहीं रहेगा।

उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी के पास पर्याप्त संख्या नहीं है, इसलिए इन चुनावों के बाद भी BSP के किसी नए सांसद के राज्यसभा पहुंचने की संभावना नहीं है। इन 10 सीटों में से बीजेपी के आठ सीटें जीतने की स्थिति में है, जबकि समाजवादी पार्टी के खाते में दो सीटें जाने की संभावना है।

यूपी विधानसभा में भी BSP का कोई विधायक नहीं

BSP के लिए स्थिति इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि 403 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधानसभा में अब उसका एक भी विधायक नहीं है। अगस्त में बलिया की रसड़ा सीट से तीन बार के विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद विधानसभा में BSP का प्रतिनिधित्व पूरी तरह खत्म हो गया।

2012 में शुरू हुआ था BSP के पतन का बड़ा दौर

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2012 को BSP के राजनीतिक पतन का अहम मोड़ माना जाता है। उस चुनाव में पार्टी की सीटें 206 से घटकर सिर्फ 80 रह गईं और उसे सत्ता से बाहर होना पड़ा।

इससे पहले हुए विधानसभा चुनाव में BSP ने 403 सदस्यीय विधानसभा में 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था। मायावती चौथी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं। इसके बाद पार्टी का विधानसभा में प्रभाव लगातार कमजोर होता गया।

2014 के बाद राष्ट्रीय स्तर पर भी कमजोर हुई पार्टी

BSP के राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर होने की शुरुआत 2014 के लोकसभा चुनाव से हुई। उस चुनाव में बीजेपी ने 303 सीटों के साथ मजबूत बहुमत हासिल किया। 2009 के लोकसभा चुनाव में BSP ने 21 सीटें जीती थीं और उसे 6.17 फीसदी वोट मिले थे। लेकिन 2014 में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। हालांकि उसका वोट शेयर 4.19 फीसदी रहा। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की बड़ी जीत को दलित वोट के BSP से बीजेपी की ओर जाने से भी जोड़ा गया। बीजेपी ने राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 71 पर जीत दर्ज की थी।

2019 में दिखी वापसी, लेकिन 2024 में फिर बड़ा झटका

इसके बाद BSP ने लोकसभा चुनावों में कुछ वापसी के संकेत दिए। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने विपक्षी महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ा था। इस गठबंधन में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल भी शामिल थे। BSP ने 10 सीटें जीतीं और उसका वोट शेयर 3.67 फीसदी रहा।

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA और कांग्रेस के नेतृत्व वाले INDIA गठबंधन, दोनों से दूरी बनाए रखी। इस चुनाव में BSP एक भी सीट नहीं जीत सकी और उसका वोट शेयर घटकर 2.06 फीसदी रह गया।

क्या BSP का कोर वोट बैंक भी खिसक रहा है?

पार्टी के लगातार कमजोर प्रदर्शन ने उसके पारंपरिक वोट बैंक पर भी सवाल खड़े किए हैं। खास तौर पर अनुसूचित जाति के वोट और इनमें भी जाटव समुदाय के समर्थन को लेकर चर्चा तेज हुई है।

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ SC वोट को लेकर बीजेपी, समाजवादी पार्टी और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के बीच मुकाबला तेज हो रहा है।

उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक करीब 21 फीसदी माना जाता है। इनमें जाटवों की हिस्सेदारी 54 फीसदी से अधिक होने का अनुमान है। BSP के पारंपरिक आधार माने जाने वाले गैर-जाटव दलितों को अपने साथ जोड़ने के लिए बीजेपी भी लगातार कोशिश कर रही है।

राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी खतरे में

BSP के सामने एक और बड़ी चुनौती चुनाव आयोग की ओर से राजनीतिक दलों की स्थिति की होने वाली समीक्षा है। पार्टी राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी खो सकती है, क्योंकि मौजूदा स्थिति में वह चुनाव आयोग की ओर से तय मानदंडों को पूरा नहीं करती है। चुनाव आयोग समय-समय पर राजनीतिक दलों की मान्यता की समीक्षा करता है।

राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए क्या हैं मानदंड?

किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने के लिए तय मानदंडों में से कम से कम एक को पूरा करना होता है। इनमें शामिल हैं:

  • पिछले लोकसभा चुनाव में चार या उससे अधिक राज्यों में कुल वैध वोटों का कम से कम 6 फीसदी हासिल करना और कम से कम चार सांसद होना।
  • लोकसभा की कम से कम 2 फीसदी सीटें जीतना और ये विजेता कम से कम तीन राज्यों से होने चाहिए।
  • कम से कम चार राज्यों में मान्यता प्राप्त राज्य पार्टी होना।

BSP के सामने अब चुनौती सिर्फ संसद में वापसी की नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश में अपने पारंपरिक राजनीतिक आधार को बनाए रखने और राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बचाने की भी है।



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